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Showing posts from October, 2017

Poem

बाजुओं में खींच के आजाये गी जैसे क़ाएनात अपने बच्चे के लिए ऐसे बाहें फेलाती है माँ ज़िन्दगी के सफ़र मै गर्दिशों की धुप में जब कोई साया नहीं मिलता तब बहुत याद आती है माँ प्यार कहते हैं किसे और ममता क्या चीज़ है कोई उन बच्चों से पूछे जिनकी मर जाती है माँ सफा-ए-हस्ती पे लिखती है असूल-ए-ज़िन्दगी इसलिए तो मक़सद-ए-इस्लाम कहलाती है माँ जब ज़िगर परदेस जाता है ए नूर-ए-नज़र कुरान लेके सर पे आ जाती है माँ लेके ज़मानत में रज़ा-ए-पाक की पीछे पीछे सर झुकाए दूर तक जाती है माँ काँपती आवाज़ में कहती है बेटा अलविदा सामने जब तक रहे हाथों को लहराती है माँ जब परेशानी में फँस जाते हैं हम परदेस में आंसुओं को पोंछने ख्वाबों में आ जाती है माँ मरते दम तक आ सका न बच्चा घर परदेस से अपनी सारी दुआएं चौखट पे छोड़ जाती है माँ बाद मरने के बेटे की खिदमत के लिए रूप बेटी का बदल के घर में आ जाती है माँ....बाजुओं में खींच के आजाये गी जैसे क़ाएनात अपने बच्चे के लिए ऐसे बाहें फेलाती है माँ ज़िन्दगी के सफ़र मै गर्दिशों की धुप में जब कोई साया नहीं मिलता तब बहुत याद आती है माँ प्यार कहते हैं किसे और म...

कहानी- सौतेली मां

कहानी- सौतेली मां  https://varymost.blogspot.com/2020/06/blog-post.html?m=1 हमने जबसे होश संभाला, आपको ही देखा, आपको ही पाया. हर क़दम पर साये की तरह pआपने ज़िंदगी की धूप से हमें बचाया. अपनी नींदें कुर्बान करके हमें रातभर थपकी देकर सुलाया. फिर भी हर ख़ुशी के मौ़के पर यहां आंसू बहाए जाते हैं कि आज हमारी सगी मां होती, तो ऐसा होता, वैसा होता… आज इतने बरसों बाद पीछे पलटकर देखती हूं, तो एक ही लफ़्ज़ बार-बार कानों में गूंजता है… सौतेली मां! ताउम्र इस एक शब्द से जंग लड़ती आ रही हूं… अब तो जैसे ये मेरी पहचान ही बन गया है. हर बार अग्निपरीक्षा, हर बात पर अपनी ममता साबित करना… जैसे कोई अपराधी हूं मैं और ये पूरा समाज ही मुझे कठघरे में खड़ा करके सवाल करने का हक़ रखता हो… क्यों दूं मैं सफ़ाई? क्यों करूं ख़ुद को साबित…? मां स़िर्फ मां होती है, उसकी ममता सगी या सौतेली नहीं होती… लेकिन कौन समझता है इन भावनाओं को. दो कौड़ी की भी क़ीमत नहीं है मेरी इन भावनाओं की…’ नंदिनी आज न जाने क्यों इस उधेड़बुन में लगी थी. आज ही क्यों, वो तो अक्सर ख़ुद से इस तरह के सवाल करती रहती है, जिनका जवाब किसी के पास नहीं होत...